“दो कौड़ी” पर बहस और एक पेड़ के नीचे पड़ा निष्प्राण पत्रकार
आज इंटरनेट पर एक ही बहस चल रही है।
टीचर्स नाराज़ हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो बन रहे हैं। पोस्ट लिखी जा रही हैं। अंजना ओम कश्यप के एक बयान को लेकर तूफान खड़ा है। बहुत से लोग कह रहे हैं कि उन्होंने यूट्यूब पर पढ़ाने वाले शिक्षकों को “दो कौड़ी का” कहा।
मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहती कि उन्होंने शब्दशः क्या कहा और क्या नहीं कहा। अगर किसी शिक्षक समुदाय को लगा है कि उनका अपमान हुआ है तो उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों के बयान आलोचना से ऊपर नहीं हो सकते।
लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच मेरे सामने एक दूसरी तस्वीर है।
एक ऐसी तस्वीर, जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया।
एक पेड़ के नीचे एक वरिष्ठ पत्रकार का निर्जीव शरीर पड़ा है।
पास में पानी की एक साधारण बोतल।
कुछ सल्फास की गोलियाँ।
और खत्म हो चुकी एक जिंदगी।
वह कोई स्टार एंकर नहीं थे।
वह प्राइम टाइम की बहसों का चेहरा नहीं थे।
वह करोड़ों फॉलोअर्स वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी नहीं थे।
वह एक पत्रकार थे।
राजेश अवस्थी।
दशकों तक पत्रकारिता करने वाले एक पत्रकार।
और आज उनकी मौत पर उतनी बहस नहीं हो रही, जितनी एक टीवी डिबेट की क्लिप पर हो रही है।
यही बात मुझे बेचैन करती है।
आज हम पत्रकारों पर चर्चा करते हैं, लेकिन केवल तब जब कोई एंकर विवादित बयान दे दे।
हम पत्रकारों को याद करते हैं, लेकिन केवल तब जब वे किसी राजनीतिक खेमे के समर्थन या विरोध में खड़े दिखाई दें।
हम मीडिया को गालियाँ देते हैं, मीडिया को “गोदी” कहते हैं, “बिका हुआ” कहते हैं, “प्रोपेगैंडा” कहते हैं।
लेकिन शायद ही कभी यह पूछते हैं कि इस उद्योग में काम करने वाले हजारों साधारण पत्रकार किस हालत में जी रहे हैं।
जो छोटे शहरों में रिपोर्टिंग करते हैं।
जो प्रिंट मीडिया में काम करते हैं।
जो वर्षों तक मेहनत करते हैं।
जिनका चेहरा कभी टीवी पर दिखाई नहीं देता।
जिनके पास करोड़ों की सैलरी नहीं होती।
जिनके पास सुरक्षा नहीं होती।
और कई बार तो नौकरी चले जाने के बाद उनके पास कोई सहारा भी नहीं होता।
मैं अंजना ओम कश्यप का बचाव नहीं कर रही।
मैं सिर्फ एक सवाल पूछ रही हूँ।
अगर अंजना ओम कश्यप आज देश की सबसे पहचान वाली एंकरों में से एक न बनतीं, तो क्या वह भी किसी राजेश अवस्थी की तरह संघर्ष करती हुई एक गुमनाम पत्रकार होतीं?
क्योंकि मीडिया उद्योग की सच्चाई यह है कि हर अंजना के पीछे हजारों राजेश अवस्थी हैं।
कुछ सफल हो जाते हैं।
बाकी धीरे-धीरे भीड़ में खो जाते हैं।
पत्रकारिता का आर्थिक संकट कोई नया विषय नहीं है।
अखबारों की बिक्री घटी है।
विज्ञापन मॉडल बदला है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पूरी व्यवस्था को बदल दिया है।
सरकारी और निजी विज्ञापनों पर निर्भरता बढ़ी है।
छोटे और मध्यम संस्थानों की कमर टूटी है।
और इसका सबसे बड़ा असर उस पत्रकार पर पड़ा है जो जमीन पर काम करता है।
लेकिन इस संकट की चर्चा शायद ही कभी होती है।
क्योंकि यह विषय ट्रेंड नहीं करता।
यह वायरल नहीं होता।
यह किसी राजनीतिक खेमे के काम नहीं आता।
इसलिए हजारों पत्रकारों का संघर्ष कभी राष्ट्रीय बहस नहीं बनता।
मुझे यह भी कहना है कि केवल सिस्टम को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।
समाज ने भी समाचार को एक मुफ्त वस्तु मान लिया है।
हम मनोरंजन के लिए भुगतान कर सकते हैं।
हम मोबाइल रिचार्ज करा सकते हैं।
हम ओटीटी का सब्सक्रिप्शन खरीद सकते हैं।
लेकिन अखबार खरीदने और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता को आर्थिक समर्थन देने की संस्कृति लगातार कमजोर हुई है।
परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता का आधार ही कमजोर हो गया।
और सबसे ज्यादा कीमत उसी व्यक्ति ने चुकाई जो खबर लिखता था।
आज सोशल मीडिया पर लाखों लोग एक बयान पर बहस कर रहे हैं।
लेकिन एक पत्रकार की मौत पर सन्नाटा है।
शायद इसलिए क्योंकि पत्रकार की मौत ट्रेंड नहीं करती।
उस पर रील नहीं बनती।
उससे राजनीतिक लाभ नहीं मिलता।
लेकिन मेरे लिए राजेश अवस्थी की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है।
वह एक चेतावनी है।
एक सवाल है।
एक आईना है।
जो हम सबके सामने रखा हुआ है।
और वह पूछ रहा है—
क्या इस देश में पत्रकार की कीमत केवल तब तक है, जब तक वह स्क्रीन पर दिखाई देता है?
या फिर हम उन हजारों गुमनाम पत्रकारों को भी याद रखेंगे, जो लोकतंत्र की इस इमारत को खड़ा रखने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं?


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